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:: सॉच का
बीज़ बोऊँगा
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के तेरे भी गात उचाटी सै, के भीतर मैं थोड़ी-सी मॉटी सै
हो तो मन्नै बताइये, पेट पाड़ कै दिखाइये
ना धौण चाहिये, ना चाहिये ढेरी
मन्नै तो मॉटी की चुटकी भतेरी
इस चुटकी तैं झूठ का बहम खोऊँगा
खेत बणा कै इसका, सॉच का बीज़ बोऊँगा
मन्नै भीत्तर पॉल कै राख्या
कितणे सॉलां संभाल कै राख्या
ना बेरा किसनै भीतर मेरै बोया था
शायद जब मैं नासमझी की नींद सोया था
के बोया मास्टर पढ़ाणिये नैं
अक बुढ़ी नानी की कहाणिया नै
बुद्ध की बाताँ नै या गांधी नै
या मॉर्क्सवाद की आँधी नैं
पर चाहे किसे नै बोया हो
चाहे किसे नै संजोया हो
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पर
ओ मेरे भीत्तर में उगा था
जिसकी फिकर में, मैं रातां नै जगा था
क्यूँकि ओ मेरे अन्दर था
सांच का पेड़ बड़ा सुन्दर था
सुणया सै पेड़ आपणे खातर जीता नहीं
फल आपणे खाता नही, आपणे गूँद नै पीता नहीं
सहज-सहज ओ पेड़ भीतर मैं फलण लाग्या
बाहर चॉलै झूठ की हवा, अपणे-आप में ढलण लाग्या
बेशक झूठ की लूआँ तैं पत्ता-पत्ता छणग्या
पर फेर भी पाकग्या फल अर बीज़ बणग्या
इब कोय ले लो, मुफ्त में बाँडूं सूँ
जिसके भीतर बोऊँ, उसने टोहंदा हाँडूं सूँ
इब तू मेरे कहनी लखाइये
अर मन्नै साच-साच बताइये
कै तरैं में भीतर |
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