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कवितायें

 
 

देस जांदा परदेस जाईये

ज़मींदारां के बालक

पौ की एक जिड़ाई रात

कोर्ट में कुत्ता

रामलील्ला

पुलिसिया रोहतास

बीरेन्द्र अर बीड़

सींग अर पूंझड़

बिदाई का गीत

माटी का चूल्हा

तांगे ऑला बूढ़

रंग-बिरंगी होली आई

चुपचाप चिड़ी का बाप

कढ़ लिया, तू पढ़ लिय

बस म्हारा हिन्दुस्तान रहैग

जय-जय हिन्द के वीर सिपाही

जय-जय हिन्द के वीर ज़वान

सुणिये मेरी माँ

न्यारे-न्यारे स्वाद जगत मैं

बाज़ार मैं घर खटाया ना करत

बख़त तैं आइये

सिर मैं धूम्मां-सा रहै सै

म्हारे हरियाणा की सै बात निरॉली

वीर हरियाणे के

तीजाँ का त्यौहार आय

चन्नी चॉला खोटा होग्य

राबड़ी भी न्यूँ बोल

सवारी-ए-सवारी

तू आदमी बणता-बणता रहग्या

गेहूँ की बॉल

सॉच का बीज़ बोऊँगा

असली हीरो

आपणी बहाण प्यारी सै

बड़ रै बड़, तेरी पाणी मैं जड़

जीणा ? किते किसा, किते किसा

रावण  | दूस्सर

 
         
 

:: रावण ::


उस दिन च्यारूं ओर, रौनक का पहरा था

और सॉलाँ की ढाल, उस दिन भी दशहरा था

 

लोग एक मैदान मैं कट्ठे हो, रावण नैं फूक आये

नई-नई बोहड़िया चहकैं थीं, थे बालक भी हर्षाये

 

सब कुछ उसा-ए था, कुछ भी ना नया था

जलता हुआ रावण देखण, मैं भी तो गया था

 

फूस जल्या, फेर रावण भी जलग्या

गरीबणी के जोबन-सा ओ ढलग्या

 

दशहरै कै नाम पै, जो होणां था होग्या

मैं भी घराँ आ कै, फटकार कै सोग्या

 

नींद के म्हाँ सुपने का, धूम्मां-सा छाग्या

चॉला होग्या मेरे सुपने मैं, वो-ए रावण आग्या

 

उस दिन रावण बहोत दुःखी था

न्यू बोल्या, भाई मैं बहोत सुखी था

 

थाम सबका दिमाग तो किताबां न भरमाया

पर किसै नै भी ना मेरे दिल का हाल सुणाया

 

भाई ताकत थी देही मैं, ज्याँ तैं थोड़ा गरूर था

दशरथ नै राम घर तै काढ़ दिया, मेरा के कसूर था

 

सब आपणे-आपणे घर मैं नचीत हो कै सौवे सैं

जिसी चाहिये जिसनै जीनस, उसा-ए बीज बोवैं सैं ==>

 

==>  ब्योंत था मेरा, ज्यां तैं हर कोय चिलम भर रहया था

आपणा राज चला रहया था, बता के जुल्म कर रहया था

 

कोय पूछणिया हो, कोय क्यूकर आपणै आपे मैं रह लेगा

कोय थारी बहाण की नाक काट ले, बता क्यूकर सह लेगा

 

मैं तो बहोत ठीक था, मन्नै ठाई होई सीता ना सताई

पर उन नैं या के करी, वा-ए सीता आग पै बिठाई

 

न्यू कहैं सैं, वो धर्म बचावण नै जंगलाँ मैं आ रहया था

कित था उसका धर्म, जब उसनै बाली लुक कै मारया था

 

थोड़ा-सा तीर-ए लॉगा था लछमण कै, के ठाडू रोया था

कुम्भकरण भी तो मेरा भाई था, मैं ना बिल्कुल रोया था

 

रहया-खहया कॉलजा तो वे उस दिन काढ़ लेगे थे

जब मेरे भाई विभीषण नै, मेरे तैं वे पाड़ लेगे थे

 

फेर इसा आदमी क्यूकर मन मै भगवान-सा रच सकै सै

जिस देस मै हो भाई-भाई का बैरी, वो बता क्यूकर बच सकै सै

 

भाई-भाई का बैर-ए नास ठाग्या

बस मैं आड़ै-ए मार खाग्या

 

इब थाम मन्नै बुरा बता कै थूकदे रहो

 बेसक आये साल मन्नै फूकदे रहो

 
         
       
 
         

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