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:: पौ की
एक जिड़ाई रात
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पौ की थी एक जिड़ाई रात
शहर मैं किसे कै आई बरात
बराती सारे, धूम्मां ठा रे
कूदैं फांदै नाचैं गा रे
किसे धनी का छोरा ब्याहण चालया था
बरात, के बरात थी पूरा काफ्ला था
बैण्ड आले बड़ी मीठी धुन बजा रे
ढ़ोल आले तो पूरा-ए खड़दू ठारे
बरात की गैल्याँ घणी ऐ लुगाईयाँ का टोल
चम-चम चमकारे लागैं होरी झम-झमरोल
एक सुथरी-सी बीरबानी कुछ उदास थी
ऊं तो सारी-ए चीज़ उसके पास थी
लौवे लॉग के सुणया तो बेरा पाट्या
उसकी जिठाणी की साड़ी उस आली तैं खास थी
आज के युग मैं, दिल नहीं मुँह सुथरा होणा चाहिये
दिमाग तैं हो चाहे जमां पैदल, पर पहरावा सुथरा होणा चाहिये
बेरा ना क्यूं मेरै ध्यान में आई
लुगाइयाँ तै मन्नै नज़र हटाई
ना तो कोय भी आण कै कह सकै सै
बरात देखण के बहानै लुगाइयाँ नै तकै सै
ढ़म ढ़म ढ़म ढ़म ढ़म बैण्ड बाजै
कोय बेसुहरा, अर कोय सुथरा नाचै
कोय पहररया कोट पैन्ट अर लारहया टाई
नाचदे गाबरूआं नै देखैं बनड़ै की चाची-ताई
या दारू तो दिखै, किसे फोड़ै सै करम
रवीना टंडन की ढाल नाचैं, ना छोटे-बड़े की शरम
पीये पाछै ना ख्याल रहै, कोण माँ, कोण दादी सै
गॉल बकैं भूण्डी, कहवैं आज मेरे यार की शादी सै
बैण्ड-मास्टर की कोण आई सज़ा
कदै कहैं यू बजा, कदै कहैं यू बजा
उसके बाजे कै जब लागैं थे शराबी हाथ
बूढ़े मास्टर के होठाँ पै लहू आवै था साथ
मुँह तैं टपकै खून, पर गाणा-बजाणा जरूरी
तन-मन मैं दर्द घणा, देखो तो या मज़बूरी
बजाता-बजाता आसमान काहनी लखावै था
आतिशबाजी की चिंगारियाँ नै शायद न्यू समझावै था
थारा तो तन बस एक बै बलै सै
पर म्हारी तो पेट की आग सुबह-शाम जलै सै
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जुण
से ब्याहे-थ्याये थे, वे आपणे बालकाँ तैं लदे थे
रहे होंगे शेर कदे, आज तो लागैं गधे थे
उन नैं के बेरा था ज़िन्दगी मैं, इसा हिसाब-किताब हो ज्यागा
मैडम बोली बालकां नै पकड़ ल्यो, मेरा लंहगा खराब हो ज्यागा
उनके तो बालक भी थे जमी लडाये
मजाल है जो धरती पै पाँव भी धराये
पर एक बालक नंगे पांयाँ आ रहया था
बरात की रौनक बढ़ाण ख़ातर, लैट सिर पै ठा रहया था
तन पै उसके पतला-सा बस एक कुर्ता लहरावै था
उसकी हिम्मत देख कै तो जॉडा भी शरमावै था
पत्थर-सी आंख उसकी, ना हांसै ना रोवै थीं
किसकै हाथ तैं पड़ैगा रूपया, बस एक याहे चीज़ टोहवैं थीं
किसे शराबी कै हाथ तैं जब रूपया पड़ ज्या था
तो छोरा उड़ै-ए जा कै अड़ ज्या था
गज़ब की काबलियत देखो, तन नै इसा झुकावै था
ना लैट पड़ण दे, अर रूपया भी झट तैं ठावै था
एक रूपये नै ठाते-ठाते यू किसा जूल्म होया
एक शराबी कै पाँयां तैं हाथ दबग्या, यू किसा सितम होया
विदेशी कम्पनी के कड़क जुत्यां नैं, नरम हाथ काट दिया
गांधी बाबा आला दस का नोट, गरीब के लहू तैं साँट दिया
फेर किसे शराबी नैं धूम मचाई
इम्पोरटिड शराब एक कान्यां छलकाई
दो-चार छींटे बालक कै हाथ पै जा लगे
सैकड़ों-हजारों-लाखों बेरा ना कितने दर्द जगे
हाथ तैं ले कै कुहणी तक दारू अर लहू की धार चली
कुणसा टपकै ज़मी पै पहल्याँ, या-ए मारै-मार चली
पर लहू कुहणी धोरै जाकै थम ग्या
रेत मैं नहीं रलूँगा कह कै जम ग्या
आफड़-धापड़ मै पहोंचगी आगलयाँ कै बरात
जाड़े की और गहरी होती गई या रात
इब यू बालक आपणै घराँ जावैगा
आगै इसका बाप पीये खाट पै धरा पावैगा
जब लहू का सना नोट उसके हाथ मैं थमावैगा
गांधी बाबा का फोटू पहलम की ढाल मुस्कावैगा
के वैष्णव जन तो तेहि कहिये जो पीर पराई जाने रे |
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