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:: जीणा
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किते किसा, किते किसा
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जीणा
किते किसा, किते किसा
जिसा देखा सै, वो उसा
जीणा
जीणा जोहड़ के म्हां नंगे बालक की ऊहद-सा
थण पकड़ कै धार लेते नाक मैं लागै दूध-सा
जेठ के महीने मैं ठण्डे पाणी की औक-सा
नई बोड़िया के हाथां तैं लीपे साफ़-सुथरे चौके-सा
टेशण के लोहे के बैंच पै सोणा, किसे फकीर का
तख़्त की जड़ मैं बैठ कै देखणा सांग रांझे-हीर का
परस की बुर्जी पै साबण तैं नहाणा किसे जनेती का
सुःख-चैन तैं धन का आणा बोई फसल पछेती का
या फेर छः भाईयाँ की बहाण का
थके-हारे का ताते पाणी तैं नहाण का
सजनी का मिलणा रोज़ का
चाहे किसे साधू की मौज़ का
नाम जीणा तो सै
शहद का पीणा तो सै
हंसी के गेल्या छोह भी तो सै
एक जीणा वो भी तो सै
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जीणा
पाणी के बार पै, लड़ै सांप के ज़हर-सा
घुप्प अन्धेरा, पौ का पॉला रात के आखरी पहर-सा
पायाँ मैं चुभती सूल-सा
बोदे डाहले की झूल-सा
याणे बालक की टोक-सा
घा कै चिपटी जोंक-सा
कुत्ते आले हाड्ड-सा
बांगर मैं आई बाढ़-सा
फसल उजड़ण की सोच-सा
घायल साँप की लोच-सा
थाम जग मैं टोहवोगे जिसा, पाओगे उसा
किते किसा, किते किसा
जिसा देखो सै, वो उसा
जीणा
किते किसा, किते किसा |
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