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:: बड़ रै
बड़, तेरी पाणी मैं जड़
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बड़ रै बड़, तेरी पाणी मैं जड़
बड़ भी सै के सहज का बड़
जिसकी थी कदे सौने की जड़
इसकै लॉगे थे सौने के बरबंटे
जबै तो ज़ॉन नै रहे थे टण्टे
बेरा ना वे कित तैं आग्ये
बरबंटा नै धोले करगस खाग्ये
जब बड़ के सारे झड़ लिए पत्ते
ठाकै चॉल्ये आपणे गुदडी-लत्ते
बादरां नै कहगे, लो इब संभालो थाम
हाम तो ठा चॉल्ये, आपणा तामझाम
बादरां की फेर होगी मौज़
करण लगेगी नई कमाई रोज़,
बड़ तलै सौवे टोपी ऑला
सूखी रोटी लंगोटी ऑला
दुःख मैं रहता, फेर भी ना रोवै
लोकतन्त्र की पहरे टोपी सोवै
गेल्यां एक गठड़ी और धरी थी
लाल-पीली टोपी वा हरी थी
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बांदर
बोल्ये, हाम पहरांगे
आड़ै के नेता हाम ठहरांगे
दुःखिया बोल्या, मेरी टोपी दे दो
मेरी रोटी और लंगोटी दे दो
बांदर हांसे खिर-खिर करकै
पर टोपी उनके सिर तैं ना सरकै
फेर गरीब नै टोपी तार बगाई
बांदरां की भी टोपी हाथ मैं आई
गरीब नै सोचा टोपी बगावैंगे
पर के बेरा था न्यूं बहकावैंगे
बांदरां ने किसी दिखाई होशियारी
एक की टोपी, दूसरै कै दे मारी
एक बगावै, दूसरा जावै था गूछ
जिसपै घणी टोपी उसकी घणी पूछ
बस उस दिन तैं बांदर
टोपियाँ नै लहरावैं सैं
गरीब नै कहैं, रोला ना कर
हाम सरकार चलावैं सैं |
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