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:: दूस्सर
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दूस्सर
ताई, तू भूलैगी क्यूकर
एक बेटी
अर एक पेटी
स्याही आख्यां मैं घॉली
गोरी साज़न-घर चॉली
कन्ध का सै उसका दामण लाल
न्यौरी पात्तियां तै छणकती चॉल
गाभरू छैल का धाकड़ साथ
गोरे-गोरे मैंहन्दी आले हाथ
उनपै चमकते दो-दो हथफूल
कूल्हे पै नाड़ा रहया सै झूल
कॉला टैम्पू भरया सै ठाड्डा
साजन कै भिड़ती जब होता आड्डा
देहॅल पिया की ना इतणी सस्ती
घर-बार लुटा ख़रीदी या मस्ती
टैम्पू जावै था, रूक-रूक कै
देखूँ पिया नै मैं, लूक-लूक कै
छोटा भाई पाणी ल्याया
कोन्या पीऊँ मन्नै ना भाया
जिसीअक बणी उसी त्यारी करी सैं
आगलियाँ की तील कूण मैं धरी सैं
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जेठ
कदे मेरा मारै झांगल
उस ख़ातर ल्याई काम्बल
दस-बारा तेरे सै बढ़िया सूट
कदे उन नै ना ले ननदी लूट
सासरै मैं सैं ना बालक थोड़े
उन की ख़ातर सैं हाथी-घोड़े
बिलंगणी का एक सूट सै न्यारा
सितारां आली इण्डी पूरी ग्यारा
पीढ़ा भरया तेरा फूलां ऑला
चरखै पै सीसां का पॉटै चॉला
जिसा जाथर था उसा करया
लोह का डिब्बा टूमा तैं भरया
सुनार नै बणाइ घड़ी थमी थमाई
कण्ठी, बुजनी नै शान बनाई
घर तैं जब कुएँ पै आई
सारै गाम मैं धूम मचाई
घड़े भरे थे वै कद रितगे
देखो तो कितणे साल बीतगे
उठै सै कदे-कदे मगज़ मैं धूली
सब भूली, पर वो दिन ना भूली
गाम मैं बदली बण कै छाई थी
जब मैं दूस्सर ले कै आई थी
दूस्सर
बेटा, मैं भूलूँगी क्यूकर |
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