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:: आपणी
बहाण प्यारी सै
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रमेश महेश सुरेश मुकेश
सतनाम हो या गुरनाम
तू कित सै, सुखी रहिये जित सै
तू उपरली हवा मैं झूलग्या
अर मन्नै जमा-ए भूलग्या
भूलै सै तो भूल जाइये
पर एक ब उस स्कूल जाइये
उस स्कूल में जित जाया करते दोनूँ
तफ़रियां में गुड़ का चूरमा खाया करते दोनूँ
तेरै याद सै, तू एक दिन पड़ग्या था
रोया था तू, नूर चेहरे का झड़ग्या था
आपणी क्लास मैं तैं मैं भॉज़ कै आई थी
जोहड़ पै भैसाँ के पाँयां मैं तैं काढ़ कै ल्याई थी
साढ़े बावन रुपये करे थे कट्ठे चवन्नी-2 जोड़ कै
याद सै तू काढ़ लेग्या था गुल्लक नै फोड़ कै
मैं तो तो कै रहगी थी, पर दुःख ना था
भाई राजी था मेरा, उसतैं बड़ा सुःख ना था
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कितणी
ब तू बिना बताये, देर रात तैं आया था
मन्नै कहग्या था, या झूठ बोल कै बाबू तैं बचाया था
जब तू छोटा था, मैं तेरा पलणा झूलाया करती
माँ घर का काम करै थी, मैं तन्नै खिलाया करती
मेरे कान तलै आज भी, झुरकटाँ का निशान सैं
पर शायद बीर मेरे, तू मेरे तैं अन्जान सै
घर-बार छोड़ तो आई, ऑकै नै अपनी दुनियां बसाई
सारे दुःख सैं दुनिया के आज, बस तू खुश रहिये मेरे भाई
मैं जाणूँ सूँ, तू भी बहाण तैं प्यार करै सै
बहाण तन्नै ज़ान तै प्यारी, बस न्यूँ-ए तकरार करै सै
भाई-बहाण के प्यार नै भूलाइये ना
छोह कितणा-ए आज्या, मन नै तू डुलाइये ना
किसे नै बहाण लागै फूल-सी, किस नै केसर क्यारी सै
इस दुनियाँ मैं सब भाईयाँ नै आपणी बहाण प्यारी सै
ज्याँ तैं कहूँ सूँ भाई मेरे, मेरा कहण पुगाइये
किसे भी भाई नै बहाण की गॉल ना सुणाइये
क्यूँकि किसी नै लागै फूल-सी, किसी-नै केसर क्यारी सै
इस दुनियाँ मैं सब भाईयाँ नै आपणी बहाण प्यारी सै
आपणी बहाण प्यारी सै |
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