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:: गेहूँ
की बॉल
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आज नहीं, वे कॉल मिली थी
मन्नै गेहूँ की बॉल मिली थी
पर देख्या किसा चॉला था
हरी ना पीली, रंग उनका काला था
मैं बोल्या, थाम काच्ची सो तो, हरी क्यों नहीं?
अर जै पाक्की सो तो, दाण्या भरयी क्यों नहीं?
काला रंग, थारी सुक्की काया खेल खिलाओगी
इस अन्न तैं जीवन चलै देस का, किसा मेल मिलाओगी
के बोवणिया नैं कोय छल करया सै
अक कमजोर बीज का फल धरया सै
के टेम पै थामनै मिल्या ना पाणी
अक बॉल चालगी कोय तन नै खाणी
अक काच्ची फसल पै ओले पड़गे
अक रोजां के रात नै टोले बड़गे
बॉलाँ नै लाम्बा-सा सांस भरया
सवाल यू कुणसा तनै आज करया
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बुआरा
होया था लाड-चाव का
खाद भी गेरया था ऊच्चे भाव का
रॉतां नै धनी नै जब पाणी लाया
लागै था, खिलैगी मेरी सयाणी काया
म्हारी पिछली जीनस भी खूब खिली थी
मण्ड़ी मै मन्नै शाबासी खूब मिली थी
पर जबतैं पास मैं या फैक्टरी खुलगी
ज़वानी म्हारी मॉटी के मैं रलगी
गात म्हारा जब सील्ली बॉल मै घूम्मां
म्हारै लिपटग्या फैक्ट्री का धूम्मां
फैक्ट्री मै तैं लिकड़या ज़हरीला पाणी
जलग्यी काया म्हारी तुरत निमाणी
डोल्या पै जो बॉल खडी थी
वे भी ट्रकां के टायराँ तैं झड़ी थी
के के बतावां हाम कयूकर सहग्यी
निपज सकी ना हाम आधम रहग्यी
बस रंग बदलग्या सांझ होग्यी
हरी भरी थी हाम बांझ होग्यी |
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