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:: देस
जांदा परदेस जाईये
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दादा देस जाँदा परदेस जाईये, इसेअक संजोग भिड़ा दिये
आपणी लाडो छोरी नै, किते शहर मैं ब्याह दिये
टोइये इसा घर, जित काम ना करणा पड़ै
सिर पै धरकै भारया दोघड़, पाणी ना भरणा पड़ै
खाट पै बैठी नै रोटी थ्यावै, सब काया मैं सुख हो
सब पै चलै हकूमत लाडो का, क्याँएं का ना दुख हो
सूण कै दादा खांस्या, फेर थोड़ा हांस्या
न्यू बोल्या, मैं इस फन्दे मैं क्युकर फह ज्यांगा
इसा घर पाग्या तो मैं उड़ै-ए ना रहै ज्यांगा
मैं इस काम ख़ातर सांझ-सवेरा खो तो दयूंगा
अर् छोरा भी शहर मैं टोह तो दयूंगा
घर बसैगा जब शहर मैं, आपणी याणी-स्याणी का
घर मै ठॉली मौज़ करैगी, ना दुख हो गोबर-पाणी का
पर शहर के हॉल देख कै, के उसका जी नहीं सूकैगा?
जब मोल के गन्ठे खावैगी, के उसका दिल नहीं दूखैगा?
अपणी-अपणी ढपली, अर अपणे-अपणे गीत रहवैं सैं
बोली बेबे, शहराँ मैं माणस नहीं; ऊँची-ऊँची भीत रहवैं सैं
प्यार नहीं, प्रेम नहीं; ना काम अकड़, ना धौस का
हाथ नै दूसरा हाथ ना जाणै, हाल यू पड़ोस का
गज़ब की बेशक भीड़ रहै, पर फिर भी सूनसान सै
माणस की कोय जॉत नहीं, मकान-नम्बर तैं पहचान सै
गाम मैं जब कोय नत्थू नै पूछण आवै
मेरे गाम का माणस घर तक छोडण जावै
अर शहर मैं भूल कै कोय पूछै नत्थू का पता
बांगा-सा मूंह करकै, कहैंगे पहल्या नम्बर बता
माँ बोली, दादा छोरी शहर मैं रहकैं, खूब बानी लावैगी
आपणें बालकां नै बढ़िया-तै-बढ़िया स्कूलाँ मैं पढ़ावैगी
नये ढाल की बात सीख कै, बालक अफ़सर बण जावैंगे
सारे ढाल की ठाड हो घर मैं, इसा घर बसावैंगे
फेर जब मैं कदे-कदे उन तैं मिलण नै जाऊंगी
भाज कै फेर वे लिपटैंगे, मैं फूली ना समाऊंगी
बहू की सूण कै बूढ़ा चिन्ता मै पड़ग्या
क्यूकर कहूँ, जी नै यू रासा करड़ा छड़ग्या
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पर बहू बुरा ना मानिये, कहणा पड़ैगा
तन्नै एक दर्द और यू भी सहणा पड़ैगा
तूँ लिपटण की बात कहै सै, वो तो तेरे लोवै भी ना आवैंगे
तेरा हाल देख कै बालक तो के, बड़े भी नाक चढ़ावैंगे
कहैवेंगे, मम्मी ये बुढ़िया यहाँ क्यों आती है ?
बायगाड इनके कपड़ों से बुरी समैल आती है
पर उननै कोण बतावै किस कारण ये लत्ते सड़े सैं
अर शहराँ के ऊंचै मकानां तलै, कितने गाम दबे पड़े सैं
वो-ए गाम, और वो-ए नाम, पर पता नहीं क्यूँ छिपावै सैं
दुःख तो यो सै, मेरे गाम के आदमी खूद नै शहर का बतावै सैं
शहर की अन्धी दौड़ न्यू तो गामाँ नै सुनसान बणा देगी
घर की ठोड़ घर ना पावैगा, हर जगहाँ दुकान बणा देगी
ना दुःख-दर्द नै बाटणियां, ना कोय प्यारा, ना रिश्तेदार होगा
बस हर आवणियां ख़रीददार होगा, घर आला दुकानदार होगा
चाहे तू खूद रहकै देख ले, खुद कहवैगी, यू किसा चाला सै
किस गेल बत्ते फोड़ैगी, थाम लुगाईयां नै चुगलियां का ढाला सै
आड़ै तो तड़कै छह बजे लुगाई, आपणे बटुये ठा-ठा चल दें सैं
ऊँची कोठियाँ मै रहणा भी कई बै इसा फल दें सैं
जाण नै जी तो ना करदा, पर क्यूकर जाण तैं नाटैं
जै सारे जणे ना कमावैं तो मकान की किस्त ना पाटै
छोड़ घणे चक्कारां नै, यू गाम मैं इसनै परणान दे
खेत में अपणे हाली का, इसनै लै के ज्वारा जाण दे
उपजे-आपजे नै हर कोए खा ले, पर उपजाणा सेहली बात नहीं
सब तैं बड़ा किसान जगत मैं, उस जैसा पवित्र गात नहीं
गाम अपणी जगहाँ, अर शहर अपणी जगहाँ जरूरी सै
पर आपणी माटी तैं हो नफ़रत, किसी या छाई गरूरी सै
थाम खूब बसो, अर खूब घसो,
पर आपणे घर नै ना बिसराइयो
खूब पढ़ाओ, खूब लिखाओ बालकां नै,
पर उन्न नैं गाम का जोहड़ भी जरूर दिखाइयो
आपणी जगहाँ तैं बिछड़ी ज़िन्दगी, क्यूकर सुख-चैन पावैगी
हवा के महाँ उड़ती उपजाऊ मिट्टी, बस केवल धूल कहावैगी
बस केवल धूल कहावैगी, बस केवल धूल कहावैगी। |
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